Rigveda Quick Jump
Navigate to any Mandal or Mantra / Rik
2.10.4
जिघ॑र्म्य॒ग्निं ह॒विषा॑ घृ॒तेन॑ प्रतिक्षि॒यन्तं॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ । पृ॒थुं ति॑र॒श्चा वय॑सा बृ॒हन्तं॒ व्यचि॑ष्ठ॒मन्नै॑ रभ॒सं दृशा॑नम् ॥ (४)
HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें
ऋग्वेद मन्त्र 2.10.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
सारे संसार में निवास करने वाले, महान्, सब जगह जाने वाले, शरीर से बढ़े हुए, हव्य जन्नों द्वारा व्याप्त, बलवान् एवं दिखाई देने वाले अग्नि की हम घृत रूपी हव्य द्वारा पूजा करते हैं. (४)
EN English Translation
We worship the agni that dwells all over the world, the great, the going everywhere, the enlarged body, the evil and visible agni by the human paradises. (4)