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ऋग्वेद

Mandal 3 • Sukta 32 • Mantra / Rik 13

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 3 • सूक्त 32 • ऋचा / मन्त्र 13

3.32.13

Mantra ID: 3.32.13

य॒ज्ञेनेन्द्र॒मव॒सा च॑क्रे अ॒र्वागैनं॑ सु॒म्नाय॒ नव्य॑से ववृत्याम् । यः स्तोमे॑भिर्वावृ॒धे पू॒र्व्येभि॒र्यो म॑ध्य॒मेभि॑रु॒त नूत॑नेभिः ॥ (१३)

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ऋग्वेद मन्त्र 3.32.13 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो इंद्र प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक स्तोत्रों द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं, उन्हीं को यजमान रक्षा करने वाले यज्ञ के द्वारा अपनी ओर आकृष्ट करता है एवं नवीन धन प्राप्त करने के लिए यज्ञ से ढकता है. (१३)

EN English Translation

Indra, who attains growth through ancient, medieval and modern hymns, attracts them to him through the yajna that protects the host and covers them with yajna to get new wealth. (13)

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