Popular:
ऋग्वेद

Mandal 3 • Sukta 54 • Mantra / Rik 15

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 3 • सूक्त 54 • ऋचा / मन्त्र 15

3.54.15

Mantra ID: 3.54.15

इन्द्रो॒ विश्वै॑र्वी॒र्यै॒३॒ः॑ पत्य॑मान उ॒भे आ प॑प्रौ॒ रोद॑सी महि॒त्वा । पु॒रं॒द॒रो वृ॑त्र॒हा धृ॒ष्णुषे॑णः सं॒गृभ्या॑ न॒ आ भ॑रा॒ भूरि॑ प॒श्वः ॥ (१५)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

ऋग्वेद मन्त्र 3.54.15 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

समस्त सामर्थ्या से युक्त इंद्र ने अपनी महिमा से धरती और आकाश दोनों को पूर्ण कर दिया है. शत्रु नगरों का ध्वंस करने वाले, वृत्रविनाशक एवं शन्रुपराभवकारिणी सेना के स्वामी इंद्र! तुम पशुओं को एकत्र करके अधिक मात्रा में हमें दो. (१५)

EN English Translation

Indra, who has all the power, has perfected both the earth and the sky with His glory. Indra, the destroyer of enemy cities, the destroyer of the vrithra-destroyer and the Shanruparabhavakrani army! You give us more quantities by collecting the animals. (15)

卐 HinduText AI