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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 1 • Mantra / Rik 16

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 1 • ऋचा / मन्त्र 16

4.1.16

Mantra ID: 4.1.16

ते म॑न्वत प्रथ॒मं नाम॑ धे॒नोस्त्रिः स॒प्त मा॒तुः प॑र॒माणि॑ विन्दन् । तज्जा॑न॒तीर॒भ्य॑नूषत॒ व्रा आ॒विर्भु॑वदरु॒णीर्य॒शसा॒ गोः ॥ (१६)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.1.16 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! स्तुति करने वाले अंगिराओं ने माता वाणी से संबंधित एवं स्तुति में सहायक शब्दों को पहले जाना. बाद में स्तुतिसंबंधी इक्कीस छंदों का ज्ञान प्राप्त किया. इसके पश्चात्‌ सबको जानती हुई उषा की स्तुति की. फिर सूर्य के तेज से अरुण वर्ण की उषा उत्पन्न हुई. (१६)

EN English Translation

O agni! The praise-giving angels first learned the words related to mother voice and helpful in praise. Later gained knowledge of the twenty-one verses of praise. After this, he praised Usha, who knew everyone, and then from the brightness of the sun, usha of the golden golden was born. (16)

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