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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 22 • Mantra / Rik 7

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 22 • ऋचा / मन्त्र 7

4.22.7

Mantra ID: 4.22.7

अत्राह॑ ते हरिव॒स्ता उ॑ दे॒वीरवो॑भिरिन्द्र स्तवन्त॒ स्वसा॑रः । यत्सी॒मनु॒ प्र मु॒चो ब॑द्बधा॒ना दी॒र्घामनु॒ प्रसि॑तिं स्यन्द॒यध्यै॑ ॥ (७)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.22.7 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! तुमने जब वृत्र राक्षस द्वारा रोकी हुई नदियों को दीर्घकालिक बंधन के पश्चात्‌ इच्छानुसार बहने के लिए स्वतंत्र किया था, तभी उन दिव्य सरिताओं ने तुम्हारे द्वारा होने वाली रक्षा के कारण तुम्हारी स्तुति की थी. (७)

EN English Translation

O Indra, lord of horses named Hari! When you freed the rivers blocked by the demon Vrithra to flow at will after long-term bondage, those divine saritas praised you for the protection you had to give. (7)

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