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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 26 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 26 • ऋचा / मन्त्र 3

4.26.3

Mantra ID: 4.26.3

अ॒हं पुरो॑ मन्दसा॒नो व्यै॑रं॒ नव॑ सा॒कं न॑व॒तीः शम्ब॑रस्य । श॒त॒त॒मं वे॒श्यं॑ स॒र्वता॑ता॒ दिवो॑दासमतिथि॒ग्वं यदाव॑म् ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.26.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मैंने सोमरस पीने से मतवाला होकर शंबर असुर के निन्यानवे नगरों को एक ही साथ नष्ट कर दिया है. मैंने यज्ञ में अतिथियों का स्वागत-सत्कार करने वाले दिवोदास को सौ सागर दिए थे. (३)

EN English Translation

I have destroyed the ninety-nine cities of SambarAs at the same time, nauseating by drinking somras. I had given a hundred seas to Divodas, who welcomed the guests to the yagna. (3)

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