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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 35 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 35 • ऋचा / मन्त्र 2

4.35.2

Mantra ID: 4.35.2

आग॑न्नृभू॒णामि॒ह र॑त्न॒धेय॒मभू॒त्सोम॑स्य॒ सुषु॑तस्य पी॒तिः । सु॒कृ॒त्यया॒ यत्स्व॑प॒स्यया॑ च॒ँ एकं॑ विच॒क्र च॑म॒सं च॑तु॒र्धा ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.35.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इस तृतीय-सवन नामक यज्ञ में ऋभुओं का रत्नदान मेरे पास आवे. तुम लोगों ने निचोड़ा हुआ सोम पिया था. तुमने अपनी कुशलता एवं कर्म की इच्छा द्वारा एक चमस के चार भाग कर दिए थे. (२)

EN English Translation

In this yagna called Tritiya-Sawan, the gemstone of the sages should come to me. You guys drank the squeezed mon. You made four parts of a spoon by your skill and desire for karma. (2)

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