Popular:
ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 41 • Mantra / Rik 8

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 41 • ऋचा / मन्त्र 8

4.41.8

Mantra ID: 4.41.8

ता वां॒ धियोऽव॑से वाज॒यन्ती॑रा॒जिं न ज॑ग्मुर्युव॒यूः सु॑दानू । श्रि॒ये न गाव॒ उप॒ सोम॑मस्थु॒रिन्द्रं॒ गिरो॒ वरु॑णं मे मनी॒षाः ॥ (८)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

ऋग्वेद मन्त्र 4.41.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे शोभन फल देने वाले दोनों देवो! रत्न की अभिलाषा करती हुई हमारी स्तुतियां रक्षा के निमित्त उसी प्रकार तुम्हारे पास जाती हैं, जिस प्रकार वीर पुरुष संग्राम की अभिलाषा करता है. जिस प्रकार गाएं सोमरस की शोभा बढ़ाने के हेतु उसके समीप रहती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां इंद्र और वरुण के समीप जाती हैं. (८)

EN English Translation

O god who bears fruit! Our praises, longing for gemstones, go to you for the sake of protection in the same way that a brave man aspires for a struggle. Just as the cows stay near Someras to beautify him, so our praises go to Indra and Varuna. (8)

卐 HinduText AI