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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 51 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 51 • ऋचा / मन्त्र 5

4.51.5

Mantra ID: 4.51.5

यू॒यं हि दे॑वीरृत॒युग्भि॒रश्वैः॑ परिप्रया॒थ भुव॑नानि स॒द्यः । प्र॒बो॒धय॑न्तीरुषसः स॒सन्तं॑ द्वि॒पाच्चतु॑ष्पाच्च॒रथा॑य जी॒वम् ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.51.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

दे दीप्तियुक्त उषाओ! तुम सोते हुए मनुष्य एवं पशुरूप जीवों को गमन के लिए जगाती हुई यज्ञ में जाने वाले घोड़ों की सहायता से सारे विश्व का तुरंत भ्रमण कर लो. (५)

EN English Translation

Give the radiant usho! Travel the whole world immediately with the help of horses that go to the yagna, awakening the sleeping human beings and animal-like creatures to travel. (5)

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