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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 56 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 56 • ऋचा / मन्त्र 3

4.56.3

Mantra ID: 4.56.3

स इत्स्वपा॒ भुव॑नेष्वास॒ य इ॒मे द्यावा॑पृथि॒वी ज॒जान॑ । उ॒र्वी ग॑भी॒रे रज॑सी सु॒मेके॑ अवं॒शे धीरः॒ शच्या॒ समै॑रत् ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.56.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

संसार में वही उत्तम कर्म वाला है, जिसने इस धरती-आकाश को उत्पन्न किया है एवं जिस धैर्यशाली ने विस्तृत, अचंचल, शोभन-रूप-युक्त एवं बिना आधार वाले धरती-आकाश को अपने कुशलतापूर्ण कार्यों द्वारा भली-भांति प्रेरित किया है. (३)

EN English Translation

It is he who has created this earth-sky in the world, and the patient who has inspired the vast, wonderful, adorned and unfounded earth-sky through his skillful works. (3)

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