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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 40 • Mantra / Rik 8

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 40 • ऋचा / मन्त्र 8

5.40.8

Mantra ID: 5.40.8

ग्राव्णो॑ ब्र॒ह्मा यु॑युजा॒नः स॑प॒र्यन्की॒रिणा॑ दे॒वान्नम॑सोप॒शिक्ष॑न् । अत्रिः॒ सूर्य॑स्य दि॒वि चक्षु॒राधा॒त्स्व॑र्भानो॒रप॑ मा॒या अ॑घुक्षत् ॥ (८)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.40.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

ब्राह्मण अत्रि ने सूर्य को उपदेश दिया, इंद्र के निमित्त सोम निचोड़ने हेतु पत्थरों को आपस में रगड़ा. स्तोत्रों द्वारा देवों की सेवा एवं अपने मंत्रों के बल से सूर्यरूपी नेत्र को अंतरिक्ष में स्थापित किया. अत्रि ने स्वर्भानु की माया को दूर कर दिया. (८)

EN English Translation

Brahmin Atri preached to the sun, rubbing stones together to squeeze the soma for Indra's sake. The hymns served the gods and with the force of their mantras installed the sun-like eye in space. Atri removed Swarbhanu's maya. (8)

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