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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 62 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 62 • ऋचा / मन्त्र 2

5.62.2

Mantra ID: 5.62.2

तत्सु वां॑ मित्रावरुणा महि॒त्वमी॒र्मा त॒स्थुषी॒रह॑भिर्दुदुह्रे । विश्वाः॑ पिन्वथः॒ स्वस॑रस्य॒ धेना॒ अनु॑ वा॒मेकः॑ प॒विरा व॑वर्त ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.62.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मित्र एवं वरुण! तुम्हारा महत्त्व इसलिए प्रसिद्ध है कि उसके द्वारा सदा घूमने वाले सूर्य ने वर्षा ऋतु के स्थावर जलों को दुहा था. तुम गतिशील सूर्य की सभी किरणों को चमकीला बनाते हो. तुम्हारा अकेला रथ धीरेधीरे चले. (२)

EN English Translation

Oh my friend and Varun! Your importance is famous because the sun, which is always rotating by it, had milked the standing waters of the rainy season. You make all the rays of the moving sun bright. Your lone chariot moves slowly. (2)

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