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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 85 • Mantra / Rik 6

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 85 • ऋचा / मन्त्र 6

5.85.6

Mantra ID: 5.85.6

इ॒मामू॒ नु क॒वित॑मस्य मा॒यां म॒हीं दे॒वस्य॒ नकि॒रा द॑धर्ष । एकं॒ यदु॒द्ना न पृ॒णन्त्येनी॑रासि॒ञ्चन्ती॑र॒वन॑यः समु॒द्रम् ॥ (६)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.85.6 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अत्यंत मेधावी वरुणदेव की स्तुति का कोई विरोध नहीं कर सकता. जलपूर्ण अनेक नदियां अकेले सागर को नहीं भर पातीं. (६)

EN English Translation

No one can resist the praise of the extremely talented Varundev. Many water-logged rivers alone do not fill the ocean. (6)

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