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ऋग्वेद

Mandal 6 • Sukta 34 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 6 • सूक्त 34 • ऋचा / मन्त्र 3

6.34.3

Mantra ID: 6.34.3

न यं हिंस॑न्ति धी॒तयो॒ न वाणी॒रिन्द्रं॒ नक्ष॒न्तीद॒भि व॒र्धय॑न्तीः । यदि॑ स्तो॒तारः॑ श॒तं यत्स॒हस्रं॑ गृ॒णन्ति॒ गिर्व॑णसं॒ शं तद॑स्मै ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 6.34.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सेवाकर्म एवं स्तुति-वचन इंद्र को बाधा नहीं पहुंचा सकते. इंद्र की वृद्धि करती हुई स्तुतियां उनके सामने जाती हैं. सैकड़ों एवं हजारों स्तोता स्तुतिपात्र इंद्र की स्तुति करके उन्हें प्रसन्न करते हैं. (३)

EN English Translation

The words of service and praise cannot hinder Indra. Indra's growing praises go before him. Hundreds and thousands of hymns please him by praising Indra. (3)

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