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ऋग्वेद

Mandal 9 • Sukta 107 • Mantra / Rik 25

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 9 • सूक्त 107 • ऋचा / मन्त्र 25

9.107.25

Mantra ID: 9.107.25

पव॑माना असृक्षत प॒वित्र॒मति॒ धार॑या । म॒रुत्व॑न्तो मत्स॒रा इ॑न्द्रि॒या हया॑ मे॒धाम॒भि प्रयां॑सि च ॥ (२५)

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ऋग्वेद मन्त्र 9.107.25 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

शुद्ध होते हुए, मरुतों से युक्त, नशीले, इंद्र द्वारा सेवित व स्तोताओं की स्तुतियों एवं हव्यों को लक्ष्य करके चले जाने वाले सोम दशापवित्र को पार करके अपनी धारा के रूप में बनते हैँ. (२५)

EN English Translation

While being purified, intoxicating, intoxicating, serving by Indra and aiming at the praises and havyas of the psalms, the Soma dashapavitra is crossed and formed as its stream. (25)

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