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ऋग्वेद

Mandal 9 • Sukta 32 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 9 • सूक्त 32 • ऋचा / मन्त्र 5

9.32.5

Mantra ID: 9.32.5

अ॒भि गावो॑ अनूषत॒ योषा॑ जा॒रमि॑व प्रि॒यम् । अग॑न्ना॒जिं यथा॑ हि॒तम् ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 9.32.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सोम! स्त्रियां जिस प्रकार अपने प्यारे प्रेमी की स्तुति करती हैं, उसी प्रकार लोगों की वाणी तुम्हारी प्रशंसा करती है. शूर जिस प्रकार संग्राम में जाता है, उसी प्रकार सोम अपने निश्चित स्थान में जाते हैं. (५)

EN English Translation

Hey Mon! Just as women praise their beloved lover, so people's voice praises you. Just as Shur goes to sangram, so som goes to his fixed place. (5)

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