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ऋग्वेद

Mandal 9 • Sukta 85 • Mantra / Rik 11

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 9 • सूक्त 85 • ऋचा / मन्त्र 11

9.85.11

Mantra ID: 9.85.11

नाके॑ सुप॒र्णमु॑पपप्ति॒वांसं॒ गिरो॑ वे॒नाना॑मकृपन्त पू॒र्वीः । शिशुं॑ रिहन्ति म॒तयः॒ पनि॑प्नतं हिर॒ण्ययं॑ शकु॒नं क्षाम॑णि॒ स्थाम् ॥ (११)

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ऋग्वेद मन्त्र 9.85.11 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

द्युलोक में उत्पन्न, शोभन पत्तों वाले एवं गिरने वाले सोम की प्रशंसा हमारी स्तुतियां करती हैं. रोते हुए शिशु के समान शुद्ध करने योग्य, स्वर्णमय, पंखों से युक्त एवं धरती पर स्थित सोम को हमारी स्तुतियां प्राप्त करती हैं. (११)

EN English Translation

Our praises praise the soothing, the soothing and falling Mon born in dulok. Like a crying baby, the pure, golden, winged and earthly soma receives our praises. (11)

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