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सामवेद

Chapter / Prapathak 10 • Dashati / Sukta 4 • Mantra 5

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 10 • दशती / सूक्त 4 • मन्त्र 5

10.4.5

Mantra ID: 10.4.5

कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद्वाजं दर्षि सहस्रिणम् । पिशङ्गरूपं मघवन्विचर्षणे मक्षू गोमन्तमीमहे ॥ (५)

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सामवेद मन्त्र 10.4.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! आप धनी, ज्ञानी, शत्रुनाशी व बहुरंगी हैं. आप हजारों तरह के वैभव व हजारों गुनी शक्ति दे सकते हैं. हम कण्ववंशी यजमान आप की उपासना करते हैं. (५)

EN English Translation

O Indra! You are rich, knowledgeable, hostile and multi-colored. You can give thousands of types of splendour and thousands of times the power. We Kanvavanshi hosts worship you. (5)

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