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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 16

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 16

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.16

Mantra: 1.16 [Kathopanishad_1.16]

तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः। तवैव नाम्ना भवितायमग्निः सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण॥ १६॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 16 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

महात्मा यमने प्रसन्न होकर उससे कहा—'अब मैं तुझे एक वर
और भी देता हूँ। यह अग्नि तेरे ही नामसे प्रसिद्ध होगा और तू इस
अनेक रूपवाली मालाको ग्रहण कर॥ १६॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 तं नचिकेतसमब्रवीत्प्रीयमाणः। शिष्ययोग्यतां पश्यन्प्रीयमाणः। प्रीतिमनुभवन्महात्माक्षुद्रबुद्धिर्वरं तव चतुर्थमिह प्रीतिनिमित्तमद्येदानीं ददामि भूयः पुनः प्रयच्छामि। तवैव नचिकेतसो नाम्नाभिधानेन प्रसिद्धो भविता मयोच्यमानोऽयमग्निः। किं च सृङ्कां शब्दवर्तीं रत्नमयीं 【भाष्यार्थ】 अपने शिष्यकी योग्यताको देखकर प्रसन्न हुए—प्रीतिका अनुभव करते हुए महात्मा—अक्षुद्रबुद्धि यमने नचिकेतासे कहा—अब मैं प्रसन्नताके कारण तुझे फिर भी यह चौथा वर और देता हूँ। मेरे द्वारा कहा हुआ यह अग्नि तुझ नचिकेताके ही नामसे प्रसिद्ध होगा तथा तू यह शब्द करनेवाली रत्नमयी, 【शाङ्करभाष्यम्】 मालामिमामनेकरूपां विचित्रां गृहाण स्वीकुरु। यद्वा सृङ्काम् अकुत्सितां गतिं कर्ममयीं गृहाण। अन्यदपि कर्मविज्ञानमनेकफलहेतुत्वात्स्वीकुर्वित्यर्थः ॥ १६ ॥ 【भाष्यार्थ】 अनेकरूपा विचित्रवर्णा माला भी ग्रहण—स्वीकार कर। अथवा सृङ्का यानी कर्ममयी अनिन्दिता गति ग्रहण कर। तात्पर्य यह है कि इसके सिवा अनेक फलका कारण होनेसे तू मुझसे कर्मविज्ञानको और भी स्वीकार कर ॥ १६ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 पुनरपि कर्मस्तुतिमेवाह— 【भाष्यार्थ】 यमराज फिर भी कर्मकी स्तुति ही करते हैं—
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