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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 20

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 20
तृतीय वर—आत्मरहस्य

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.20

Mantra: 1.20 [Kathopanishad_1.20]

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये— ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वरणामेष वरस्तृतीयः ॥ २० ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 20 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मरे हुए मनुष्यके विषयमें जो यह सन्देह है कि कोई तो कहते

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【भाष्यार्थ】 हैं 'रहता है' और कोई कहते हैं 'नहीं रहता' आपसे शिक्षित हुआ मैं इसे जान सकूँ। मेरे वरोंमें यह तीसरा वर है ॥ २० ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 येयं विचिकित्सा संशयः प्रेते मृते मनुष्येऽस्तीत्येकेऽस्ति शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिव्यतिरिक्तो देहान्तरसम्बन्ध्यात्मेत्येके नायमस्तीति चैके नायमेवंविधोऽस्तीति चैकेऽतश्चास्माकं न प्रत्यक्षेण नापि वानुमानेन निर्णयविज्ञानमेतद्विज्ञानाधीनो हि परः पुरुषार्थ इत्यत एतद्विद्यां विजानीयामहमनुशिष्टो ज्ञापितस्त्वया। वराणाम् एष वरस्तृतीयोऽवशिष्टः ॥ २० ॥ 【भाष्यार्थ】 मरे हुए मनुष्यके विषयमें जो इस प्रकारका सन्देह है कि कोई लोग तो ऐसा कहते हैं कि शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे अतिरिक्त देहान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्मा रहता है और किन्हींका कथन है कि ऐसा कोई आत्मा नहीं रहता; अतः इसके विषयमें हमें प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे कोई निश्चित ज्ञान नहीं होता और परम पुरुषार्थ इस विज्ञानके ही अधीन है। इसलिये आपसे शिक्षित अर्थात् विज्ञापित होकर मैं इसे भली प्रकार जान सकूँ। यही मेरे वरोंमेंसे बचा हुआ तीसरा वर है ॥ २० ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 किमयमेकान्ततो निःश्रेयससाधनात्मज्ञानार्हो न वेत्येतत्परीक्षणार्थमाह— 【भाष्यार्थ】 यह (नचिकेता) निःश्रेयसके साधन आत्मज्ञानके योग्य पूर्णतया है या नहीं—इस बातकी परीक्षा करनेके लिये यमराजने कहा—
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