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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 26

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 26
नचिकेताकी निरीहता

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.26

Mantra: 1.26 [Kathopanishad_1.26]

श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैत- त्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 26 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे यमराज ! ये भोग 'कल रहेंगे या नहीं'—इस प्रकारके हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके तेजको जीर्ण कर देते हैं। यह सारा जीवन भी बहुत थोड़ा ही है। आपके वाहन और नाच-गान आपके ही पास रहें [हमें उनकी आवश्यकता नहीं है] ॥ २६ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 श्वो भविष्यन्ति न भविष्यन्ति वेति सन्दिह्यमान एव येषां भावो भवनं त्वयोपन्यस्तानां भोगानां ते श्वोभावाः। किं च मर्त्यस्य मनुष्यस्यान्तक हे मृत्यो यदेतत्सर्वेन्द्रियाणां तेजस्तज्जरयन्ति अपक्षयन्त्यप्सरःप्रभृतयो भोगा अनर्थायैवैते धर्मवीर्यप्रज्ञातेजोयशः-प्रभृतीनां क्षपयितृत्वात् । यां चापि दीर्घजीविकां त्वं दित्ससि तत्रापि शृणु। सर्वं यद्ब्रह्माणोऽपि जीवितमायुरल्पमेव किमुतास्मदादि- 【भाष्यार्थ】 आपने जिन भोगोंका उल्लेख किया है वे तो श्वोभाव हैं—जिनका भाव अर्थात् अस्तित्व 'कल रहेंगे या नहीं' इस प्रकार सन्देहयुक्त हो उन्हें श्वोभाव कहते हैं। बल्कि हे अन्तक—हे मृत्यो ! ये अप्सरा आदि भोग तो मनुष्यका जो यह सम्पूर्ण इन्द्रियोंका तेज है उसे जीर्ण—क्षीण ही कर देते हैं, अतः धर्म, वीर्य, प्रज्ञा, तेज और यश आदिका क्षय करनेवाले होनेसे ये अनर्थके ही कारण हैं। और आप जो दीर्घजीवन देना चाहते हैं उसके विषयमें भी सुनिये। ब्रह्माका जो सम्पूर्ण जीवन—आयु है वह भी अल्प ही है, 【शाङ्करभाष्यम्】 दीर्घजीविका। अतस्त्वैव तिष्ठन्तु वाहा रथादयस्तथा नृत्यगीते च ॥ २६ ॥ 【भाष्यार्थ】 फिर हम-जैसोंके दीर्घजीवनकी तो बात ही क्या है? अतः आपके रथादि वाहन और नाच-गान आपके ही रहें ॥ २६ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 किं च— 【भाष्यार्थ】 इसके सिवा—
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