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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 29

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 29

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.29

Mantra: 1.29 [Kathopanishad_1.29]

यस्मिनिदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 29 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मृत्यो! जिस (परलोकगत जीव)-के सम्बन्धमें लोग 'है या नहीं है' ऐसा सन्देह करते हैं तथा जो महान् परलोकके विषयमें

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【भाष्यार्थ】 [निश्चित विज्ञान] है वह हमसे कहिये। यह जो गहनतामें अनुप्रविष्ट हुआ वर है इससे अन्य और कोई वर नचिकेता नहीं माँगता॥ २९॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 यस्मिन्प्रेत इदं विचिकित्सनं- विचिकित्सन्ति अस्ति नास्तीत्येवंप्रकारं हे मृत्यो साम्पराये परलोकविषये महति महत्प्रयोजननिमित्ते आत्मनो निर्णयविज्ञानं यत्तद्ब्रूहि कथय नोऽस्मभ्यम्। किं बहुना योऽयं प्रकृत आत्मविषयो वरो गूढं गहनं दुर्विवेचनं प्राप्तोऽनुप्रविष्टः तस्माद्वरादन्यमविवेकिभिः प्रार्थनीय- मनित्यविषयं वरं नचिकेता न वृणीते मनसापीतिश्रुतेर्वचन- मिति॥ २९॥ 【भाष्यार्थ】 हे मृत्यो! जिस परलोकगत जीवके विषयमें ऐसा सन्देह करते हैं कि मरनेके अनन्तर 'रहता है या नहीं रहता' उस महान्-महान् प्रयोजनके निमित्तभूत साम्पराय—परलोकके सम्बन्धमें उस आत्माका जो निश्चित विज्ञान है वह हमसे कहिये। अधिक क्या, यह जो आत्मविषयक प्रकृत वर है वह बड़ा ही गूढ—गहन है और दुर्विवेचनीयताको प्राप्त हो रहा है। उस वरसे अन्य अविवेकी पुरुषोंद्वारा प्रार्थनीय कोई और अनित्य वस्तुविषयक वर नचिकेता मनसे भी नहीं माँगता— यह श्रुतिका वचन है॥ २९॥
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