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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 4

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 4
पिता-पुत्र-संवाद

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.4

Mantra: 1.4 [Kathopanishad_1.4]

स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति । द्वितीयं तृतीयं तंहोवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 4 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

तब वह अपने पितासे बोला—'हे तात ! आप मुझे किसको देंगे ?' इसी प्रकार उसने दोबारा-तिबारा भी कहा । तब पिताने उससे 'मैं तुझे मृत्युको दूँगा' ऐसा कहा ॥ ४ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 तदेवं क्रत्वसम्पत्तिनिमित्तं पितुरनिष्टं फलं मया पुत्रेण सता निवारणीयमात्मप्रदानेनापि क्रतुसम्पत्तिं कृत्वेत्येवं मत्वा पितरम् उपगम्य स होवाच पितरं हे तत तात कस्मै ऋत्विग्विशेषाय दक्षिणार्थं मां दास्यसि प्रयच्छसि 【भाष्यार्थ】 तब, इस प्रकार यज्ञकी पूर्णता न होनेके कारण पिताको प्राप्त होनेवाला अनिष्ट फल मुझ-जैसे सत्पुत्रको आत्म-बलिदान करके भी निवृत्त करना चाहिये—ऐसा मानकर वह पिताके समीप जाकर बोला—'हे तात ! आप मुझे किस ऋत्विग्विशेषको दक्षिणामें देंगे ?' इस 【शाङ्करभाष्यम्】 इत्येतत्। एवमुक्तेन पित्रोपेक्ष्य- माणोऽपि द्वितीयं तृतीय- मप्युवाच कस्मै मां दास्यसि कस्मै मां दास्यसीति। नायं कुमारस्वभाव इति क्रुद्धः सन्पिता तं ह पुत्रं किलोवाच मृत्यवे वैवस्वताय त्वा त्वां ददामीति ॥ ४ ॥ 【भाष्यार्थ】 प्रकार कहनेपर पिताद्वारा बारम्बार उपेक्षा किये जानेपर भी उसने दूसरे-तीसरे बार भी यही बात कही कि 'मुझे किसको देंगे? मुझे किसको देंगे?' तब पिता यह सोचकर कि यह बालकोंके- से स्वभाववाला नहीं है, क्रोधित हो गया और उस पुत्रसे बोला— 'मैं तुझे सूर्यके पुत्र मृत्युको देता हूँ' ॥ ४ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 स एवमुक्तः पुत्र एकान्ते परिदेवयाञ्चकार। कथम् ? इत्युच्यते— 【भाष्यार्थ】 पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह पुत्र एकान्तमें अनुताप करने लगा, किस प्रकार? सो बतलाते हैं—
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