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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 6

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 6

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.6

Mantra: 1.6 [Kathopanishad_1.6]

अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 6 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस प्रकार पूर्वपुरुष व्यवहार करते थे उसका विचार कीजिये तथा जैसे वर्तमानकालीन अन्य लोग प्रवृत्त होते हैं उसे भी देखिये। मनुष्य खेतीकी तरह पकता (वृद्ध होकर मर जाता) है और खेतीकी भाँति फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ ६ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 अनुपश्यालोचय निभालय सन्मार्गः सदैव अनुक्रमेण यथा सेवनीयः येन प्रकारेण वृत्ताः पूर्वे अतिक्रान्ताः पितृपितामहादयस्तव। तान्दृष्ट्वा च तेषां वृत्तमास्थातुमर्हसि। वर्तमानाश्चापरे साधवो यथा वर्तन्ते तांश्च प्रतिपश्यालोचय तथा न च तेषु मृषाकरणं वृत्तं वर्तमानं वास्ति। तद्विपरीतमसतां च वृत्तं मृषाकरणम्। न च मृषा 【भाष्यार्थ】 आपके पिता-पितामह आदि पुरुष अनुक्रमसे जिस प्रकार आचरण करते आये हैं उसकी आलोचना कीजिये—उसपर दृष्टि डालिये। उन्हें देखकर आपको उन्हींके आचरणोंका पालन करना चाहिये। तथा वर्तमानकालीन जो दूसरे साधुलोग आचरण करते हैं उनकी भी आलोचना कीजिये। उनमेंसे किसीका भी आचरण अपने कथनको मिथ्या करना नहीं था और न इस समय ही किसीका है। इसके विपरीत असत्पुरुषोंका आचरण मिथ्या करना ही है। किन्तु अपने आचरणको मृषा करके कोई अजर-अमर नहीं 【शाङ्करभाष्यम्】 कृत्वा कश्चिदजरामरो भवति। यतः सस्यमिव मर्त्यो मनुष्यः पच्यते जीर्णो म्रियते। मृत्वा च सस्यमिव आजायत आविर्भवति पुनरेवमनित्ये जीवलोके किं मृषाकरणेन। पालय आत्मनः सत्यम्। प्रेषय मां यमाय इत्यभिप्रायः॥ ६॥ 【भाष्यार्थ】 हो सकता। क्योंकि मनुष्य खेतीकी तरह पकता अर्थात् जीर्ण होकर मर जाता है, तथा मरकर खेतीके समान पुनः उत्पन्न—आविर्भूत हो जाता है। इस प्रकार इस अनित्य जीवलोकमें असत्य आचरणसे लाभ ही क्या है? अतः अपने सत्यका पालन कीजिये अर्थात् मुझे यमराजके पास भेजिये॥ ६॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 स एवमुक्तः पितात्मनः सत्यतायै प्रेषयामास। स च यमभवनं गत्वा तिस्रो रात्रीः उवास यमे प्रोषिते। प्रोष्यागतं यमममात्या भार्या वा ऊचु- र्बोधयन्तः— 【भाष्यार्थ】 पुत्रके इस प्रकार कहनेपर पिताने अपनी सत्यताकी रक्षाके लिये उसे यमराजके पास भेज दिया। वह यमराजके घर पहुँचकर तीन रात्रि टिका रहा, क्योंकि यम उस समय बाहर गये हुए थे। प्रवाससे लौटनेपर यमराजसे उनकी भार्या अथवा मन्त्रियोंने समझाते हुए कहा—
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