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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 8

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 8

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.8

Mantra: 1.8 [Kathopanishad_1.8]

आशाप्रतीक्षे संगतं सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् । एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 8 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिसके घरमें ब्राह्मण-अतिथि बिना भोजन किये रहता है उस
मन्दबुद्धि पुरुषकी ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंकी प्राप्तिकी इच्छाएँ,
उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाले फल, प्रिय वाणीसे होनेवाले फल,
यागादि इष्ट एवं उद्यानादि पूर्त कर्मोंके फल तथा समस्त पुत्र और
पशु आदिको वह नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 आशाप्रतीक्षे अनिज्ञाताप्राप्त्यर्थ- अतिथ्युपेक्षणे प्रार्थना आशा दोषाः निज्ञाताप्राप्त्यर्थ- प्रतीक्षणं प्रतीक्षा ते आशाप्रतीक्षे, संगतं तत्संयोगजं फलम्, सूनृतां च सूनृता हि प्रिया वाक्तन्निमित्तं च, इष्टापूर्ते इष्टं यागजं पूर्तमारामादिक्रियाजं फलम्, पुत्र- पशूंश्च पुत्रांश्च पशूंश्च सर्वानितत्सर्वं यथोक्तं वृङ्क्ते आवर्जयति विनाशयतीत्येतत्—पुरुषस्याल्पमेधसो- ऽल्पप्रज्ञस्य—यस्यानश्नन्नभुञ्जानो ब्राह्मणो गृहे वसति । तस्मा- दनुपेक्षणीयः सर्वावस्था- स्वप्यतिथिरित्यर्थः ॥ ८ ॥ 【भाष्यार्थ】 जिसके घरमें ब्राह्मण बिना भोजन किये रहता है उस मन्दमति पुरुषके ‘आशा-प्रतीक्षा’—आशा—जिनका कोई ज्ञान नहीं है उन प्राप्य इष्ट पदार्थोंकी इच्छा तथा अपने प्राप्य ज्ञात पदार्थोंकी प्रतीक्षा एवं संगत—उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाले फल, सूनृता—प्रिय वाणी और उससे होनेवाले फल, ‘इष्टापूर्त’— इष्ट—यागादिसे प्राप्त होनेवाले फल और पूर्त—बाग-बगीचोंके लगानेसे होनेवाले फल तथा पुत्र और पशु—इन उपर्युक्त सभीको नष्ट कर देता है। अतः तात्पर्य यह है कि अतिथि सभी अवस्थाओंमें अनुपेक्षणीय है ॥ ८ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 एवमुक्तो मृत्युरुवाच नचिकेतासमुपगम्य पूजा-पुरःसरम्— 【भाष्यार्थ】 [मन्त्रियोंद्वारा] इस प्रकार कहे जानेपर यमराजने नचिकेताके पास जा उसकी पूजा करनेके अनन्तर कहा—
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