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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 9

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 9
यमराजका वरप्रदान

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.9

Mantra: 1.9 [Kathopanishad_1.9]

तिस्रो रात्रीर्यदवासीद्गृहे मे अनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः। नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ९ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 9 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे ब्रह्मन्! तुम्हें नमस्कार हो; मेरा कल्याण हो। तुम नमस्कारयोग्य अतिथि होकर भी मेरे घरमें तीन रात्रितक बिना भोजन किये रहे; अतः एक-एक रात्रिके लिये एक-एक करके मुझसे तीन वर माँग लो ॥ ९ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 तिस्रो रात्रीर्यस्मादवासीत्ः, उषितवानसि गृहे मे ममानश्नन् हे ब्रह्मन्नतिथिः सन्नमस्यो नमस्कारार्हश्च तस्मान्ममस्ते तुभ्यमस्तु भवतु। हे ब्रह्मन्स्वस्ति भद्रं मेऽस्तु तस्माद्भवतोऽनशनेन मद्गृहवास-निमित्ताद्दोषात्तत्प्राप्त्युपशमेन। यद्यपि भवदनुग्रहेण सर्वं मम स्वस्ति स्यात्तथापि त्वदधिक-संप्रसादार्थमनशनेनोषिताम् एकैकां रात्रिं प्रति त्रीन्वरान् वृणीष्व अभिप्रेतार्थविशेषान् प्रार्थयस्व मत्तः ॥ ९ ॥ 【भाष्यार्थ】 हे ब्रह्मन्! क्योंकि अतिथि और नमस्कारयोग्य होकर भी तुम तीन रात्रितक बिना कुछ भोजन किये मेरे घरमें रहे हो, अतः तुम्हें नमस्कार है। हे ब्रह्मन्! मेरे घरमें बिना भोजन किये आपके निवास करनेके निमित्तसे हुए दोषसे, उससे प्राप्त हुए अनिष्ट फलकी शान्तिद्वारा, मेरा मङ्गल—शुभ हो। यद्यपि आपकी कृपासे ही मेरा सब प्रकार कल्याण हो जायगा, तथापि अपनी अधिक प्रसन्नताके लिये तुम बिना भोजन किये बितायी हुई एक-एक रात्रिके प्रति मुझसे तीन वर—अपने अभीष्ट पदार्थविशेष माँग लो ॥ ९ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 नचिकेतास्त्वाह— 【शाङ्करभाष्यम्】 यदि दित्सु- वरान्— 【भाष्यार्थ】 नचिकेताने कहा—यदि आप वर देना चाहते हैं तो—
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