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कठोपनिषद् • वल्ली 3, मन्त्र 12

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 3 • मन्त्र 12
आत्मा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है

Katha Upanishad (Kathopanishad) 3.12

Mantra: 3.12 [Kathopanishad_3.12]

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः॥१२॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 12 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशमान नहीं होता। यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषोंद्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्मबुद्धिसे ही देखा जाता है ॥ १२ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 एष पुरुषः सर्वेषु ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु भूतेषु गूढः संवृतो दर्शनश्रवणादिकर्माविद्या-मायाच्छन्नोऽत एवात्मा न प्रकाशत आत्मत्वेन कस्यचित्। अहो अतिगम्भीरा दुरवगाह्या विचित्रा माया चेयं यदयं सर्वो जन्तुः परमार्थतः परमार्थसतत्त्वोऽप्येवं बोध्यमानोऽहं परमात्मेति न 【भाष्यार्थ】 यह पुरुष ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब-पर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंमें गूढ यानी छिपा हुआ, दर्शन, श्रवण आदि कर्म करनेवाला तथा अविद्या यानी मायासे आच्छादित है। अतः सबका अन्तरात्मस्वरूप होनेके कारण आत्मा किसीके प्रति प्रकाशित नहीं होता। अहो! यह माया बड़ी ही गम्भीर, दुर्गम और विचित्र है, जिससे कि ये संसारके सभी जीव वस्तुतः परमार्थस्वरूप होनेपर भी [शास्त्र और आचार्यद्वारा] वैसा बोध 【शाङ्करभाष्यम्】 गृह्णात्यनात्मानं देहेन्द्रियादि- सङ्घातमात्मनो दृश्यमानमपि घटादिवदात्मत्वेनाहममुष्य पुत्र इत्यनुच्यमानोऽपि गृह्णाति। नूनं परस्यैव मायया मोमुह्यमानः सर्वो लोको बम्भ्रमीति। तथा च स्मरणम्—‘नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः’ (गीता ७। २५) इत्यादि। 【शाङ्करभाष्यम्】 ननु विरुद्धमिदमुच्यते ‘‘मत्वा धीरो न शोचति’’ (क० उ० २। १।४) ‘‘न प्रकाशते’’ (क० उ० १।३।१२) इति च। 【शाङ्करभाष्यम्】 नैतदेवम्। असंस्कृत- बुद्धेरविज्ञेयत्वान्न प्रकाशत इत्युक्तम्। दृश्यते तु संस्कृतया अग्र्यया अग्रमिवाग्र्या तया, एकाग्रतयोपेतयेत्येतत्, सूक्ष्मया सूक्ष्मवस्तुनिरूपणपरया; कैः? सूक्ष्मदर्शिभिः ‘‘इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्थाः’’ इत्यादिप्रकारेण 【भाष्यार्थ】 कराये जानेपर ‘मैं परमात्मा हूँ’ इस तत्त्वको ग्रहण नहीं करते; बल्कि जो देह और इन्द्रिय आदि संघात घटादिके समान अपने दृश्य हैं, उन्हें किसीके न कहनेपर भी ‘मैं इसका पुत्र हूँ’ इत्यादि प्रकारसे आत्मभावसे ग्रहण करते हैं। निश्चय, उस परमात्माकी ही मायासे यह सारा जगत् अत्यंत भ्रान्त हो रहा है। “‘योगमायासे आवृत हुआ मैं सबके प्रति प्रकाशित नहीं होता’” ऐसी ही यह स्मृति भी है। 【भाष्यार्थ】 शङ्का—किन्तु “‘उसे जानकर पुरुष शोक नहीं करता’” “[वह गूढ आत्मा] प्रकाशित (ज्ञात) नहीं होता’ यह तो विपरीत ही कहा गया है। 【भाष्यार्थ】 समाधान—ऐसी बात नहीं है। आत्मा अशुद्धबुद्धिपुरुषके लिये अविज्ञेय है; इसीलिए यह कहा गया है कि ‘वह प्रकाशित नहीं होता’। वह तो संस्कारयुक्त और तीक्ष्ण—जो किसी पैनी नोकके समान सूक्ष्म हो ऐसी एकाग्रतासे युक्त और सूक्ष्म वस्तुके निरीक्षणमें लगी हुई तीव्र बुद्धिसे ही दिखलायी देता है। किन्हें दिखलायी देता है? [इसपर कहते हैं—] सूक्ष्मदर्शियोंको। ‘‘इन्द्रियोंसे उनके विषय सूक्ष्म हैं’’ इत्यादि प्रकारसे 【शाङ्करभाष्यम्】 सूक्ष्मतापारम्पर्यदर्शनेन परं सूक्ष्मं द्रष्टुं शीलं येषां ते सूक्ष्म- दर्शिनस्तैः सूक्ष्मदर्शिभिः पण्डितैरित्येतत् ॥ १२ ॥ 【भाष्यार्थ】 सूक्ष्मताकी परम्पराका विचार करनेसे जिनका पर-सूक्ष्म वस्तुको देखनेका स्वभाव पड़ गया है, वे सूक्ष्मदर्शी हैं; उन सूक्ष्मदर्शी पण्डितोंको [वह दिखलायी देता है]—यह इसका भावार्थ है ॥ १२ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 तत्प्रतिपत्त्युपायमाह— 【भाष्यार्थ】 अब उसकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं—
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