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कठोपनिषद् • वल्ली 3, मन्त्र 5

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 3 • मन्त्र 5
अविवेकीकी विवशता

Katha Upanishad (Kathopanishad) 3.5

Mantra: 3.5 [Kathopanishad_3.5]

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 5 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

किन्तु जो [बुद्धिरूप सारथी] सर्वदा अविवेकी एवं असंयतचित्तसे युक्त होता है उसके अधीन इन्द्रियाँ इसी प्रकार नहीं रहतीं जैसे सारथीके अधीन दुष्ट घोड़े ॥ ५ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 तत्रैवं सति यस्तु बुद्ध्याख्यः सारथिरविज्ञानवाननिपुणोऽविवेकी प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च भवति यथेतरः रथचर्यायामयुक्तेन अप्रगृहीतेनासमाहितेन मनसा प्रग्रहस्थानीयेन सदा युक्तो भवति तस्याकुशलस्य बुद्धिसारथेः इन्द्रियाण्यश्वस्थानीयान्यवश्यानि अशक्यनिवारणानि दुष्टाश्वा अदान्ताश्च इवेतरसारथेर्भवन्ति ॥ ५ ॥ 【भाष्यार्थ】 किन्तु ऐसा होनेपर भी जो बुद्धिरूप सारथी अविज्ञानवान्—अकुशल अर्थात् रथसञ्चालनमें अकुशल अन्य सारथीके समान [इन्द्रियरूप घोड़ोंकी] प्रवृत्ति-निवृत्तिके विवेकसे रहित है, जो सर्वदा प्रग्रह (लगाम) स्थानीय अयुक्त—अगृहीत अर्थात् विक्षिप्त चित्तसे युक्त है उस अनिपुण बुद्धिरूप सारथीके इन्द्रियरूप घोड़े [रथादि हाँकनेवाले ] अन्य सारथीके दुष्ट अर्थात् बेकाबू घोड़ोंके समान अवश्य यानी जिनका निवारण नहीं किया जा सकता ऐसे हो जाते हैं ॥ ५ ॥
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