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कठोपनिषद् • वल्ली 3, मन्त्र 7

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 3 • मन्त्र 7
अविवेकीकी संसारप्राप्ति

Katha Upanishad (Kathopanishad) 3.7

Mantra: 3.7 [Kathopanishad_3.7]

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाशुचिः । न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 7 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

किन्तु जो अविज्ञानवान्, अनिगृहीतचित्त और सदा अपवित्र रहनेवाला होता है वह उस पदको प्राप्त नहीं कर सकता, प्रत्युत संसारको ही प्राप्त होता है ॥ ७ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 यस्त्वविज्ञानवान्भवति अमनस्कोऽप्रगृहीतमनस्कः स तत एवाशुचिः सदैव, न स रथी तत्पूर्वोक्तमक्षरं यत्परं पदम् आप्नोति तेन सारथिना। न केवलं कैवल्यं नाप्नोति संसारं च जन्ममरणलक्षणमधिगच्छति ॥ ७ ॥ 【भाष्यार्थ】 किन्तु जो अविज्ञानवान्, अमनस्क—असंयतचित्त और इसीलिए सदा अपवित्र रहनेवाला होता है उस सारथीके द्वारा वह [जीवरूप] रथी उस पूर्वोक्त अक्षर परम पदको प्राप्त नहीं कर सकता। वह कैवल्यको प्राप्त नहीं होता—केवल इतना ही नहीं, बल्कि जन्म-मरणरूप संसारको भी प्राप्त होता है ॥ ७ ॥
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