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Katha Upanishad (Kathopanishad) 4.2
पराचः कामाननुयन्ति बाला- स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्। अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥
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उपनिषद मन्त्र संख्या 2 का आध्यात्मिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हुए पाशमें पड़ते हैं । किन्तु विवेकी पुरुष अमरत्वको ध्रुव (निश्चल)
जानकर संसारके अनित्य पदार्थोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते ॥ २ ॥