Popular:

कठोपनिषद् • वल्ली 4, मन्त्र 2

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 4 • मन्त्र 2
अविवेकी और विवेकीका अन्तर

Katha Upanishad (Kathopanishad) 4.2

Mantra: 4.2 [Kathopanishad_4.2]

पराचः कामाननुयन्ति बाला- स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्। अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥

卐

HinduText AI से इस उपनिषद मन्त्र का ब्रह्मज्ञान समझें

उपनिषद मन्त्र संख्या 2 का आध्यात्मिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अल्पज्ञ पुरुष बाह्य भोगोंके पीछे लगे रहते हैं । वे मृत्युके सर्वत्र फैले
हुए पाशमें पड़ते हैं । किन्तु विवेकी पुरुष अमरत्वको ध्रुव (निश्चल)
जानकर संसारके अनित्य पदार्थोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते ॥ २ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 पराचो बहिर्गतानेव कामान् काम्यान्विषयाननुयन्ति अनुगच्छन्ति 【भाष्यार्थ】 बाल—मन्दमति पुरुष पराक्— बाह्य कामनाओंका—काम्यविषयोंका ही अनुगमन—पीछा किया करते हैं । 【शाङ्करभाष्यम्】 बाला अल्पप्रज्ञास्ते तेन कारणेन मृत्योरविद्याकामकर्मसमुदायस्य यन्ति गच्छन्ति विततस्य विस्तीर्णस्य सर्वतो व्याप्तस्य पाशं पाश्यते बध्यते येन तं पाशं देहेन्द्रियादिसंयोगवियोगलक्षणम् । अनवरतजन्ममरणजरारोगाद्यनेकानर्थव्रातं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः । यत एवमथ तस्माद्धीरा विवेकिनः प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणममृतत्वं ध्रुवं विदित्वा, देवाद्यमृतत्वं ह्यध्रुवमिदं तु प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणं "न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्" ( बृ० उ० ४ । ४ । २३ ) इति ध्रुवम् । तदेवम्भूतं कूटस्थमविचालयममृतत्वं विदित्वाध्रुवेषु सर्वपदार्थेष्वनित्येषु निर्धार्य ब्राह्मणा इह संसारेऽनर्थप्राये न प्रार्थयन्ते किञ्चिदपि प्रत्यगात्मदर्शनप्रतिकूलत्वात् । पुत्रवित्तलोकैषणाभ्यो व्युत्तिष्ठन्त्येवेत्यर्थः ॥ २ ॥ 【भाष्यार्थ】 इसी कारणसे वे अविद्या काम और कर्मके समुदायरूप मृत्युके वितत—विस्तीर्ण—सर्वत्र व्याप्त पाशमें [पड़ते हैं]। जिससे जीव पाशित होता है—बाँधा जाता है उस देहेन्द्रियादिके संयोग-वियोगरूप पाशमें पड़ते हैं। अर्थात् निरन्तर जन्म-मरण, जरा और रोग आदि बहुतसे अनर्थसमूहको प्राप्त होते हैं। क्योंकि ऐसी बात है इसलिये धीर—विवेकी पुरुष प्रत्यगात्मस्वरूपमें स्थितिरूप अमृतत्वको ध्रुव (निश्चल) जानकर; देवता आदिका अमृतत्व तो अध्रुव है, किन्तु यह प्रत्यगात्मस्वरूपमें स्थितिरूप अमृतत्व "यह कर्मसे न बढ़ता है न घटता है" इस उक्तिके अनुसार ध्रुव है। इस प्रकारके अमृतत्वको कूटस्थ और अविचाल्य जानकर वे ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) लोग इस अनर्थप्राय संसारके सम्पूर्ण अध्रुव—अनित्य पदार्थोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते, क्योंकि वे सब तो प्रत्यगात्माके दर्शनके विरोधी ही हैं। अर्थात् वे पुत्र, वित्त और लोकैषणासे दूर ही रहते हैं ॥ २ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 यद्विज्ञानान्न किञ्चिदन्यत् प्रार्थयन्ते ब्राह्मणाः कथं तदधिगम इत्युच्यते— 【भाष्यार्थ】 ब्राह्मण लोग जिसका ज्ञान हो जानेसे और किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करते उस ब्रह्मका बोध किस प्रकार होता है ? इसपर कहते हैं—
卐 HinduText AI