Popular:

कठोपनिषद् • वल्ली 5, मन्त्र 8

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 5 • मन्त्र 8
गुह्य ब्रह्मोपदेश

Katha Upanishad (Kathopanishad) 5.8

Mantra: 5.8 [Kathopanishad_5.8]

य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ८ ॥

卐

HinduText AI से इस उपनिषद मन्त्र का ब्रह्मज्ञान समझें

उपनिषद मन्त्र संख्या 8 का आध्यात्मिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

प्राणादिके सो जानेपर जो यह पुरुष अपने इच्छित पदार्थोंकी रचना करता हुआ जागता रहता है वही शुक्र (शुद्ध) है, वह ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है। उसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं; कोई भी उसका उल्लङ्घन नहीं कर सकता। निश्चय यही वह [ब्रह्म] है ॥ ८ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 य एष सुप्तेषु प्राणादिषु जागर्ति न स्वपिति । कथम् ? कामं कामं तं तमभिप्रेतं स्त्र्याद्यर्थमविद्यया निर्मिमाणो निष्पादयञ्जागर्ति पुरुषो यस्तदेव शुक्रं शुभ्रं शुद्धं तद्ब्रह्म नान्यद् गुह्यं ब्रह्मास्ति । तदेवामृत-मविनाशि उच्यते सर्वशास्त्रेषु । किं 【भाष्यार्थ】 जो यह प्राणादिके सो जानेपर जागता रहता है—[उनके साथ] सोता नहीं है। किस प्रकार जागता रहता है ? [इसपर कहते हैं—] अविद्याके योगसे स्त्री आदि अपने-अपने इच्छित—अभीष्ट पदार्थोंकी रचना करता हुआ अर्थात् उन्हें निष्पन्न करता हुआ जागता है वही शुक्र—शुभ्र यानी शुद्ध है। वह ब्रह्म है, उससे भिन्न और कोई गुह्य ब्रह्म नहीं है। वही सब शास्त्रोंमें अमृत—अविनाशी कहा गया है। 【शाङ्करभाष्यम्】 च पृथिव्यादयो लोकास्तस्मिन्नेव सर्वे ब्रह्माण्याश्रिताः सर्व- लोककारणत्वात्तस्य । तदु नात्येति कश्चन इत्यादि पूर्ववदेव ॥ ८ ॥ 【भाष्यार्थ】 यही नहीं, उस ब्रह्ममें ही पृथिवी आदि सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं, क्योंकि वह सभी लोकोंका कारण है । उसका कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता [निश्चय यही वह ब्रह्म है] इत्यादि [आगेकी व्याख्या] पूर्ववत् समझनी चाहिये ॥ ८ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 अनेकतार्किककुबुद्धिविचालि- तान्तःकरणानां प्रमाणोपपन्नम् अप्यात्मैकत्वविज्ञानमसकृदुच्यमान- मप्यनृजुबुद्धीनां ब्राह्मणानां चेतसि नाधीयत इति तत्प्रतिपादन आदरवती पुनः पुनराह श्रुतिः — 【भाष्यार्थ】 अनेक तार्किकोंकी कुबुद्धिद्वारा जिनका चित्त चञ्चल कर दिया गया है, अतः जिनकी बुद्धि सरल नहीं है उन ब्राह्मणोंके चित्तमें, प्रमाणसे युक्त सिद्ध होनेपर भी, आत्मैकत्व-विज्ञान बारम्बार कहे जानेपर भी स्थिर नहीं होता । अतः उसके प्रतिपादनमें आदर रखनेवाली श्रुति पुनः-पुनः कहती है—
卐 HinduText AI