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कठोपनिषद् • वल्ली 6, मन्त्र 11

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 6 • मन्त्र 11

Katha Upanishad (Kathopanishad) 6.11

Mantra: 6.11 [Kathopanishad_6.11]

तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 11 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

उस स्थिर इन्द्रियधारणाको ही योग कहते हैं। उस समय पुरुष प्रमादरहित हो जाता है, क्योंकि योग ही उत्पत्ति और नाशरूप है ॥ ११ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 तामीदृशीं तदवस्थां योगम् इति मन्यन्ते वियोगमेव सन्तम्। सर्वानर्थसंयोगवियोगलक्षणा हीयमवस्था योगिनः। एतस्यां ह्यवस्थायामविद्याध्यारोपणवर्जित- 【भाष्यार्थ】 उस ऐसी अवस्थाको ही—जो वास्तवमें वियोग ही है—योग मानते हैं, क्योंकि योगीकी यह अवस्था सब प्रकारके अनर्थसंयोगकी वियोगरूपा है। इस अवस्थामें ही आत्मा अपने अविद्यादि आरोपसे रहित स्वरूपमें 【शाङ्करभाष्यम्】 स्वरूपप्रतिष्ठ आत्मा। स्थिराम् इन्द्रियधारणां स्थिरामचलाम् इन्द्रियधारणां बाह्यान्तःकरणानां धारणमित्यर्थः। अप्रमत्तः प्रमादवर्जितः समाधानं प्रति नित्यं यत्नवांस्तदा तस्मिन्काले यदैव प्रवृत्तयोगो भवतीति सामर्थ्यादवगम्यते। न हि बुद्ध्यादिचेष्टाभावे प्रमादसंभवोऽस्ति। तस्मात्प्रागेव बुद्ध्यादिचेष्टोपरमादप्रमादो विधीयते। अथवा यदैवेन्द्रियाणां स्थिरा धारणा तदानीमेव निरङ्कुशमप्रमत्तत्वमित्यतः, अभिधीयतेऽप्रमत्तस्तदा भवतीति। कुतः? योगो हि यस्मात् प्रभावाप्ययौ उपजनापायधर्मक इत्यर्थोऽतोऽपायपरिहारायाप्रमादः कर्तव्य इत्यभिप्रायः॥ ११॥ 【भाष्यार्थ】 स्थित रहता है। [उस अवस्थाको ही] स्थिर इन्द्रियधारणा कहते हैं—स्थिर अर्थात् अचल इन्द्रियधारणा यानी बाह्य और आन्तरिक करणोंको धारण करना। तब—उस समय साधक पुरुष अप्रमत्त—प्रमादरहित हो जाता है, अर्थात् चित्तसमाधानके प्रति सर्वदा सयत रहता है; जिस समय कि वह योगमें प्रवृत्त होता है [उस समय ऐसी स्थिति होती है]—ऐसा इस वाक्यकी सामर्थ्यसे जाना जाता है, क्योंकि बुद्धि आदिकी चेष्टाका अभाव हो जानेपर प्रमाद होना सम्भव नहीं है। अतः बुद्धि आदिकी चेष्टाका अभाव होनेसे पूर्व ही अप्रमादका विधान किया जाता है। अथवा जिस समय भी इन्द्रियोंकी धारणा स्थिर होती है उसी समय निरङ्कुश अप्रमत्तत्व होता है; इसीलिए 'उस समय अप्रमत्त हो जाता है' ऐसा कहा है। ऐसी बात क्यों है? क्योंकि योग ही प्रभव और अप्यय यानी उत्पत्ति और लयरूप धर्मवाला है; अतः तात्पर्य यह है कि अपाय (लय)-की निवृत्तिके लिये प्रमादका अभाव करना चाहिये॥ ११॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 बुद्ध्यादिचेष्टाविषयं चेद् ब्रह्मेदं तदिति विशेषतो गृहीत बुद्ध्याद्युपरमे 【भाष्यार्थ】 यदि ब्रह्म बुद्धि आदिकी चेष्टाका विषय होता तो 'यह वह [ब्रह्म] है' 【शाङ्करभाष्यम्】 च ग्रहणकरणाभावाद् अनुपलभ्यमानं नास्त्येव ब्रह्म। यद्धि करणगोचरं तदस्तीति प्रसिद्धं लोके विपरीतं चासद् इत्यत्रानर्थको योगः। अनुपलभ्यमानत्वाद्वा नास्तीत्युपलब्धव्यं ब्रह्मेत्येवं प्राप्त इदमुच्यते—सत्यम्, 【भाष्यार्थ】 इस प्रकार विशेषरूपसे ग्रहण किया जा सकता था; किन्तु बुद्धि आदिके निवृत्त हो जानेपर तो उसे ग्रहण करनेके कारणका अभाव हो जानेसे उपलब्ध न होनेवाला वह ब्रह्म वस्तुतः है ही नहीं। लोकमें जो वस्तु इन्द्रियगोचर होती है वही 'है' इस प्रकार प्रसिद्ध होती है और इसके विपरीत [इन्द्रियगोचर न होनेवाली] वस्तु 'असत्' कही जाती है, अतः योग व्यर्थ है। अथवा उपलब्ध होनेवाला न होनेसे ब्रह्म 'नहीं है' इस प्रकार जानना चाहिये—ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है—ठीक है,
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