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यजुर्वेद

Adhyaya 17 • Mantra 10

Yajurveda (यजुर्वेद)

यजुर्वेद • अध्याय 17 • मन्त्र 10

17.10

Mantra ID: 17.10

पा॒व॒कया॒ यश्चि॒तय॑न्त्या कृ॒पा क्षाम॑न् रुरु॒चऽउ॒षसो॒ न भा॒नुना॑ । तूर्व॒न् न याम॒न्नेत॑शस्य॒ नू रण॒ऽआ यो घृ॒णे न त॑तृषा॒णोऽअ॒जरः॑ ॥ (१०)

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यजुर्वेद मन्त्र 17.10 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! आप पवित्र करने वाली ज्वालाओं से प्रदीप्त होते हैं. जैसे उघा काल में किरणों से घिरा हुआ सूर्य शोभता है, वैसे ही आप ज्चालाओं से शोभते हैं. जैसे वेगवान घोड़े पर बैठा हुआ सैनिक शोभा देता है, उसी प्रकार आप अपने वेग (तेज) से शोभा पाते हैं. (१०)

EN English Translation

O agni! You are illuminated by the consecrated flames. Just as the sun adorns with rays in the high time, so you are adorned with the rays. Just as a soldier sitting on a fast horse adorns, so you are adorned with your velocity (fast). (10)

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