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यजुर्वेद

Adhyaya 5 • Mantra 38

Yajurveda (यजुर्वेद)

यजुर्वेद • अध्याय 5 • मन्त्र 38

5.38

Mantra ID: 5.38

उ॒रु वि॑ष्णो॒ विक्र॑मस्वो॒रु क्षया॑य नस्कृधि । घृतं घृ॑तयोने पिब॒ प्रप्र॑ य॒ज्ञप॑तिं तिर॒ स्वाहा॑ ॥ (३८)

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यजुर्वेद मन्त्र 5.38 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अग्नि व्यापक, बलशाली व शत्रुनाशी हैं. वे मनुष्य को पराक्रमी बनाएं. वे घृत योनि हैं. वे घृत पीने व यजमान की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. (३८)

EN English Translation

Fire is widespread, powerful and hostile. They should make man mighty. They are disgusting vaginas. Please drink a lot and increase the host. (38)

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