Popular:
ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 95 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 95 • ऋचा / मन्त्र 4

1.95.4

Mantra ID: 1.95.4

क इ॒मं वो॑ नि॒ण्यमा चि॑केत व॒त्सो मा॒तॄर्ज॑नयत स्व॒धाभिः॑ । ब॒ह्वी॒नां गर्भो॑ अ॒पसा॑मु॒पस्था॑न्म॒हान्क॒विर्निश्च॑रति स्व॒धावा॑न् ॥ (४)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

ऋग्वेद मन्त्र 1.95.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे यजमानो! जल, वन आदि में गर्भरूप से स्थित अग्नि को तुम में से कोन जानता है? अर्थात्‌ कोई नहीं. यह पुत्र होकर भी अपनी जलरूपी माताओं को हव्य द्वारा जन्म देता है. यह प्रौढ़ तेज वाला, क्रांतदर्शी एवं हवि रूप अन्न से युक्त अग्नि अनेक प्रकार के जलों को उत्पन्न करने का कारण बनकर समुद्र से सूर्य रूप में निकलता है. (४)

EN English Translation

O hosts! Who among you knows the agni inherently in water, forest, etc. i.e. none. It, even being a son, gives birth to its water-like mothers through havan. This adult, fast-paced, and crystalline agni comes out of the sea in the form of the sun, causing the production of many types of water. (4)

卐 HinduText AI