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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 95 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 95 • ऋचा / मन्त्र 5

1.95.5

Mantra ID: 1.95.5

आ॒विष्ट्यो॑ वर्धते॒ चारु॑रासु जि॒ह्माना॑मू॒र्ध्वः स्वय॑शा उ॒पस्थे॑ । उ॒भे त्वष्टु॑र्बिभ्यतु॒र्जाय॑मानात्प्रती॒ची सिं॒हं प्रति॑ जोषयेते ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.95.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मेघों में तिरछे रहने वाले जल की गोद में रहकर भी ऊपर की ओर जलता हुआ अग्नि शोभन दीप्ति वाला बनकर चमकता एवं बढ़ता है. त्वष्टा से उत्पन्न अग्नि से धरती और आकाश दोनों डरते हैं एवं सहनशील अग्नि के समीप आकर सेवा करते हैं. (५)

EN English Translation

Even in the lap of water that remains diagonally in the clouds, the agni burning upwards shines and grows brightly. Both the earth and the sky are afraid of the agni produced by the skin and come close to the forbearing agni and serve. (5)

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