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5.44.8
ज्यायां॑सम॒स्य य॒तुन॑स्य के॒तुन॑ ऋषिस्व॒रं च॑रति॒ यासु॒ नाम॑ ते । या॒दृश्मि॒न्धायि॒ तम॑प॒स्यया॑ विद॒द्य उ॑ स्व॒यं वह॑ते॒ सो अरं॑ करत् ॥ (८)
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ऋग्वेद मन्त्र 5.44.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे अतिशय वृद्ध ऋषियों द्वारा स्तुत एवं गमनशील सूर्य! जिन स्तुतियों में तुम्हारे प्रति श्रद्धा भाव है, तुम्हें प्रसिद्ध करने वाले कमों से युक्त उन स्तुतियों द्वारा यजमान तुम्हारी सेवा करते हैं. वे जिस बात की कामना करते हैं, उसे वास्तविक रूप से जान लेते हैं. अपनी इच्छा से तुम्हारी सेवा करने वाले पर्याप्त फल पाते हैं. (८)
EN English Translation
O sun praised and moved by the most aged sages! The hosts serve you by those praises that have reverence for you, those praises containing those who make you famous. They really know what they want. Those who serve you of their own will get enough fruit. (8)