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5.44.9
स॒मु॒द्रमा॑सा॒मव॑ तस्थे अग्रि॒मा न रि॑ष्यति॒ सव॑नं॒ यस्मि॒न्नाय॑ता । अत्रा॒ न हार्दि॑ क्रव॒णस्य॑ रेजते॒ यत्रा॑ म॒तिर्वि॒द्यते॑ पूत॒बन्ध॑नी ॥ (९)
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ऋग्वेद मन्त्र 5.44.9 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हमारा प्रधान स्तोत्र उसी प्रकार सूर्य को प्राप्त हो, जिस प्रकार सरिताएं सागर के पास जाती हैं. यज्ञशाला में की गई सूर्यस्तुति कभी समाप्त नहीं होती, जिस स्थान में सूर्य के प्रति पवित्र भावना रहती है, वहां यजमानों की अभिलाषा कभी अपूर्ण नहीं रहती. (९)
EN English Translation
May our main hymns be received by the sun in the same way that the saritas go to the sea. The suryasuti performed in the yajnashala never ends, in the place where there is a sacred feeling for the sun, the desire of the hosts is never incomplete. (9)