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ऋग्वेद

Mandal 6 • Sukta 45 • Mantra / Rik 25

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 6 • सूक्त 45 • ऋचा / मन्त्र 25

6.45.25

Mantra ID: 6.45.25

इ॒मा उ॑ त्वा शतक्रतो॒ऽभि प्र णो॑नुवु॒र्गिरः॑ । इन्द्र॑ व॒त्सं न मा॒तरः॑ ॥ (२५)

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ऋग्वेद मन्त्र 6.45.25 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सैकड़ों प्रकार के यज्ञ करने वाले इंद्र! जिस प्रकार गाएं बछड़ों के पास बार-बार जाती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां तुम्हारे समीप पहुंचें. (२५)

EN English Translation

O Indra who performs hundreds of kinds of yajna! Just as the cows go to the calves again and again, so so our praises come to you. (25)

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