Popular:
ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 51 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 51 • ऋचा / मन्त्र 2

8.51.2

Mantra ID: 8.51.2

अ॒यु॒जो अस॑मो॒ नृभि॒रेकः॑ कृ॒ष्टीर॒यास्यः॑ । पू॒र्वीरति॒ प्र वा॑वृधे॒ विश्वा॑ जा॒तान्योज॑सा भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑ ॥ (२)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

ऋग्वेद मन्त्र 8.51.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

किसी की सहायता न लेने वाले, अद्वितीय, देवों में प्रमुख और विनाशरहित इंद्र प्राचीन प्रजाओं का अतिक्रमण करके बढ़ते हैं. इंद्र के दान कल्याण करने वाले हैं. (२)

EN English Translation

Indra, who does not take anyone's help, unique, prominent among the gods and without destruction, grows by encroaching on the ancient subjects. Indra's donations are welfare. (2)

卐 HinduText AI