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अथर्ववेद

Kanda 11 • Sukta 1 • Mantra 8

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 11 • सूक्त 1 • मन्त्र 8

11.1.8

Mantra ID: 11.1.8

इ॒यं म॒ही प्रति॑ गृह्णातु॒ चर्म॑ पृथि॒वी दे॒वी सु॑मन॒स्यमा॑ना । अथ॑ गच्छेम सुकृ॒तस्य॑ लो॒कम् ॥ (८)

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अथर्ववेद मन्त्र 11.1.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

देवगण की यह भूमि बिछे हुए चर्म को स्वीकार करे एवं हमारे प्रति कोमल हृदय बन कर दया करे. पृथ्वी की कृपा के कारण हम यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्ग में पहुंचें. (८)

EN English Translation

May this land of gods accept the lying skin and have compassion for us with a soft heart. Due to the grace of the earth, we should reach heaven as the fruit of yajna. (8)

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