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11.5.15
तत॑श्चैनम॒न्याभ्यां॒ पादा॑भ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न् । ब॑हुचा॒री भ॑विष्य॒सीत्ये॑नमाह । तं वा अ॒हं ना॒र्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म् । अ॒श्विनोः॒ पादा॑भ्याम् । ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम् । ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः । सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (१५)
HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें
अथर्ववेद मन्त्र 11.5.15 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे-“हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिन पैरों की सहायता से इस ओदन का सेवन किया था, उस से भिन्न अर्थात् लौकिक पैरों की सहायता से यदि तुम ने इस ओदन का सेवन किया तो तुम बहुचरी अर्थात् निरर्थक बहुत चलने वाले बनोगे.” इस के उत्तर में शिष्य अपने गुरु से कहे कि मैं ने इस ओदन का सेवन न तो पराङ्मुख होकर किया है, न सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने इस का सेवन अश्चिनीकुमारों रूपी चरणों की सहायता से किया है. मैं ने इसे वहीं पहुंचा दिया है जहां इसे जाना था. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. इस स्थिति से जो उस ओदन का सेवन करता है, वह समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. वह स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में स्थित होता है. (१५)
EN English Translation
The Guru should say to his disciple thus- "O Devdatta! If you consume this odan with the help of cosmic feet, then you will become bahuchari i.e. meaningless very walking. It has not been done from the front, nor by the spirit. I have consumed this with the help of the steps of Aschinikumars. I have delivered it where it had to go. This odan is full of all organs, with all joints and with a whole body. From this position, the one who consumes that odan is full of all organs, with all joints and full body. He is situated in the virtuous worlds like heaven etc. (15)