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अथर्ववेद

Kanda 11 • Sukta 7 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 11 • सूक्त 7 • मन्त्र 1

11.7.1

Mantra ID: 11.7.1

ब्रह्मचा॒रीष्णंश्च॑रति॒ रोद॑सी उ॒भे तस्मि॑न्दे॒वाः संम॑नसो भवन्ति । स दा॑धार पृथि॒वीं दिवं॑ च॒ स आ॑चा॒र्यं तप॑सा पिपर्ति ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 11.7.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

वेदों का अध्ययन करने वाला अपने तप से धरती और आकाश दोनों में व्याप्त होता है. इंद्र आदि सभी देव इस ब्रह्मचारी के प्रति अनुग्रह करते हैं. यह ब्रह्मचारी अपने तप से धरती और स्वर्ग को धारण करता है तथा सन्मार्ग पर चलता हुआ अपने आचार्य का पालन करता है. (१)

EN English Translation

The one who studies the Vedas pervades both the earth and the sky through his penance. All gods like Indra have mercy on this brahmachari. This brahmachari wears the earth and heaven with his penance and follows his master by walking on the right path. (1)

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