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अथर्ववेद

Kanda 11 • Sukta 9 • Mantra 25

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 11 • सूक्त 9 • मन्त्र 25

11.9.25

Mantra ID: 11.9.25

प्रा॑णापा॒नौ चक्षुः॒ श्रोत्र॒मक्षि॑तिश्च॒ क्षिति॑श्च॒ या । उच्छि॑ष्टाज्जज्ञिरे॒ सर्वे॑ दि॒वि दे॒वा दि॑वि॒श्रितः॑ ॥ (२५)

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अथर्ववेद मन्त्र 11.9.25 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

प्राण और अपान वायु, नेत्र, कान, विनाश का अभाव और विनाश, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव-ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (२५)

EN English Translation

Prana and Apana Vayu, eyes, ears, lack of destruction and destruction, God in heaven and heaven - all these yajnasheshesh have originated from Brahman. (25)

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