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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 1 • Mantra 12

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 1 • मन्त्र 12

12.1.12

Mantra ID: 12.1.12

यत्ते॒ मध्यं॑ पृथिवि॒ यच्च॒ नभ्यं॒ यास्त॒ ऊर्ज॑स्त॒न्वः संबभू॒वुः । तासु॑ नो धेह्य॒भि नः॑ पवस्व मा॒ता भूमिः॑ पु॒त्रो अ॒हं पृ॑थि॒व्याः प॒र्जन्यः॑ पि॒ता स उ॑ नः पिपर्तु ॥ (१२)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.1.12 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे पृथ्वी! तेरी नाभि अर्थात्‌ मध्य भाग से सभी के शरीरों को पुष्ट करने वाले जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, मुझे उन्हीं के मध्य स्थित करो. भूमि मेरी माता है और मेघ मेरे पिता हैं. ये दोनों यज्ञ कर्म को पूर्ण करते हैं. (१२)

EN English Translation

O Earth! Place me in the middle of your navel, the substances that strengthen everyone's bodies. Bhumi is my mother and Megh is my father. Both of them complete the yajna karma. (12)

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