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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 2 • Mantra 41

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 2 • मन्त्र 41

12.2.41

Mantra ID: 12.2.41

ता अ॑ध॒रादुदी॑ची॒राव॑वृत्रन्प्रजान॒तीः प॒थिभि॑र्देव॒यानैः॑ । पर्व॑तस्य वृष॒भस्याधि॑ पृ॒ष्ठे नवा॑श्चरन्ति स॒रितः॑ पुरा॒णीः ॥ (४१)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.2.41 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जल देव मार्ग के द्वारा दक्षिण से उत्तर को जाते हैं तथा नवीन बन कर वर्षा के रूप पर्वत पर नदी का रूप धारण कर लेते हैं. (४१)

EN English Translation

Water god goes from south to north through the way and becomes new and takes the form of a river on the mountain in the form of rain. (41)

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