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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 2 • Mantra 43

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 2 • मन्त्र 43

12.2.43

Mantra ID: 12.2.43

इ॒मं क्र॒व्यादा वि॑वेशा॒यं क्र॒व्याद॒मन्व॑गात् । व्या॒घ्रौ कृ॒त्वा ना॑ना॒नं तं ह॑रामि शिवाप॒रम् ॥ (४३)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.2.43 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इस पुरुष ने क्रव्याद अग्नि का अपने घर में प्रवेश कर लिया है तथा यह उसी का अनुगामी हो गया है. मैं उन दोनों को बाधक के समान मानता हूं तथा इस क्रव्याद अग्नि को अलग करता हूं. (४३)

EN English Translation

This man has entered his house of Kravyad Agni and it has become a follower of him. I consider both of them as obstacles and separate this kravyad agni. (43)

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