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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 2 • Mantra 51

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 2 • मन्त्र 51

12.2.51

Mantra ID: 12.2.51

येश्र॒द्धा ध॑नका॒म्या क्र॒व्यादा॑ स॒मास॑ते । ते वा अ॒न्येषां॑ कु॒म्भीं प॒र्याद॑धति सर्व॒दा ॥ (५१)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.2.51 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो मनुष्य धन की इच्छा से क्रव्याद अग्नि की सेवा करते हैं, वे पुरुष सदा दूसरों की रक्षा करते हैं. (५१)

EN English Translation

Those men who serve the agni of kravyad with the desire of wealth, those men always protect others. (51)

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