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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 2 • Mantra 55

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 2 • मन्त्र 55

12.2.55

Mantra ID: 12.2.55

प्र॒त्यञ्च॑म॒र्कं प्र॑त्यर्पयि॒त्वा प्र॑वि॒द्वान्पन्थां॒ वि ह्यावि॒वेश॑ । परा॒मीषा॒मसू॑न्दि॒देश॑ दी॒र्घेणायु॑षा॒ समि॒मान्त्सृ॑जामि ॥ (५५)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.2.55 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

गार्हपत्य अग्नि सूर्य को अर्पित हो कर देवयान मार्ग में प्रविष्ट हुई थी और जिन के प्राणों को नष्ट कर दिया, मैं उन यजमानों को चिर आयु से युक्त करता हूं. (५५)

EN English Translation

I associate those hosts with eternal life when the agni of Garhapatya was offered to the Sun and entered the Path of Devayana and whose lives were destroyed. (55)

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