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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 3 • Mantra 32

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 3 • मन्त्र 32

12.3.32

Mantra ID: 12.3.32

नवं॑ ब॒र्हिरो॑द॒नाय॑ स्तृणीत प्रि॒यं हृ॒दश्चक्षु॑षो व॒ल्ग्वस्तु । तस्मि॑न्दे॒वाः स॒ह दै॒वीर्वि॑शन्त्वि॒मं प्राश्न॑न्त्वृ॒तुभि॑र्नि॒षद्य॑ ॥ (३२)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.3.32 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

ओदन रखने के लिए नवीन कुशा फैला दो. यह कुशा का आसन हृदय और नेत्रों को सुंदर लगे. देवता उस पर अपनी पत्नियों सहित विराजमान होते हुए इस ओदन का सेवन करें. (३२)

EN English Translation

Spread a new skillet to keep the odan. This kusha asana looks beautiful to the heart and eyes. The gods should sit on it with their wives and consume this odan. (32)

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